Wednesday, 17 August 2016

हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है-7
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आओ भगवान् की परीक्षा लें!
    इस लेख का शीर्षक पढ़ कर ही कईं बंधुओं की भवें तन गई होगी!कईंयों ने मन ही मन में सोचा होगा कि ये कौन तुर्रमखां है तो भगवान् की परीक्षा लेने निकल पडा है!कईं अति उत्साही बंधू लेख का शीर्षक पढ़ कर ही,बिना लेख की अंतिम पंक्ति तक पहुंचे ही,कोई दनदनाती टिप्पणी ठोंक कर लेखक को चारों खाने चित्त करने का भाव लिए उखड जायेंगे!लेकिन मेरा विनम्र निवेदन है कि कृपया लेख को पूरा पढ़े.अंतिम पंक्ति तक पहुँचते पहुँचते अपने गिरेबान में झाँक कर आप स्वयं भगवान् के बड़े परीक्षक ना साबित हो जाओ,तो कहना!
     हमने भगवान् को बंधुआ मजदूर मान लिया है,जो हमारे इच्छित काम हर हालत में करेगा ही!हमने भगवान् को वो सरकारी बाबू भी मान लिया है,जो कुछ ले देकर हमारे काम कर ही देगा!ये कैसी सोच है हमारी?भगवान् को भगवान् मानने की समझ अब तक हममें क्यूँ ना पैदा हो पायी?भगवान् से से आखिर क्यूँ हमने स्वार्थ का रिश्ता बना लिया?मेरे ये प्रश्न आपको चौंका रहे  होंगे,किन्तु आप अगर शांत चित्त से विचार करेंगे तो आपको ये प्रश्न सहज लगने लगेंगे.
     भगवान की प्रतिमा के सम्मुख खड़े हो हम क्या करते हैं?क्या हम वाकई वही करते हैं जो हमें करना चाहिए?क्या हम प्रतिमा के सम्मुख संसार की झंझटों को छोड़ कर,वास्तविक प्रार्थना कर पाते हैं?
     हम भी बड़े अजीब लोग है!भगवान् कहते हैं संसार के झंझटों में मत पड़ो.हम उसकी सुनते नहीं,बल्कि उसको भी संसार के झंझटों में खींच लेने की कोशिश करते रहते हैं! उससे मन की शांन्ति नहीं मांगते,जो कि वे देने में सक्षम में, अपितु उनसे धन, दौलत, शौहरत, संतान, गाडी, बंगला, सट्टे में जीत, दो नम्बरी धंधे में सफलता, दुश्मनों का सफाया....आदि आदि ना जाने क्या क्या बेतुकी चीजें मांगते रहते हैं, और वो भी उसकी परीक्षा लेते हुए! भगवान् अगर आपने मेरा ये काम नहीं किया तो मेरा आपसे विश्वास उठ जाएगा, मैं आपके द्वार फिर कभी नहीं आउंगा! और दुसरे रूप में कहें तो भगवान् आप मेरा काम कर देंगे तो में फलाने फलाने दिन आपके दर्शन करने आउंगा! भक्त, ये भगवान् की कैसी परीक्षा भाई? और उससे भी आगे बढ़ें तो, भगवान को लालच देकर, सरकारी बाबू की तरह कुछ ले देकर काम करवाने में भी हमारा कोई सानी नहीं! ये काम कर दिया तो इतने का प्रसाद चढाउंगा, ये काम कर दिया तो 4-6 बसें लेकर तेरे धाम आउंगा, ये काम कर दिया तो तुझे हीरे-मोती का मुकुट चढाउंगा! कैसी सोच है हमारी? भगवान् को किस स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया हमने? संसार की जिन चीजों से उनका मोह भंग हो गया, हम उनसे वे ही चीजें अपने लिए मांगते हैं! और नहीं दें, तो भगवान् को परीक्षक बन कर चैलेन्ज, धमकी भी दे डालते हैं! इतना ही नहीं, एक कदम आगे बढ़ कर कुछ ले देकर उनसे काम करवाने की अपनी प्रवृति का प्रदर्शन कदम कदम पर करते रहते हैं!
     कृपया भगवान् को भगवान बने रहने दें! न तो उनके परीक्षक बनें और ना ही उन्हें सरकारी बाबू बनाने की कोशिश करें! मोह-माया और संसार को त्याग कर ही वे भगवान् बने हैं, और शांत मुद्रा में प्रतिमा के रूप में बिराजमान है. हमको अगर सांसारिक सुख(?) चाहिए तो हम पुरुषार्थ कर पाते रहें. हाँ, सांसारिक सुखों(?) को भोगते भोगते जब मन अशांत हो जाए, और शान्ति दुनिया में कहीं ना मिले, तो भगवान् से जा कर मांगे, वहां ज़रूर मिलेगी और भरपूर मिलेगी. भगवान् आखिर भगवान है! वे हमें अशांत करने वाली सांसारिक चीजें कैसे दे सकते हैं? उनके पास तो शान्ति जैसी सुखदायक अनमोल चीज़ का खजाना है, वो हमें मांगना भी नहीं पड़ता. वे ये खजाना हर क्षण लुटाते रहते हैं, अब ये हम पर है कि हम वो वास्तविक खज़ाना लेकर कितना मालामाल हो पाते हैं!
अपन ने जो सोचा-समझा,आपको बता दिया।अब आपको ठीक लगे तो आप भी इस पर विचार करें।मैं और ज्यादा कुछ बोलूंगा तो फिर आप ही बोलोगे कि बोलता है !

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लेखक- अशोक पुनमिया
लेखक-कवि-पत्रकार 
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'

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