Wednesday, 17 August 2016

हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है-8
-------------------------------------------
तीर्थयात्रा और चटोरापन !

    
     तीर्थयात्रा और चटोरेपन में यूँ तो कुछ भी सामंजस्य नहीं है,किन्तु हमने इसमें भी मेल कर रखा है,तथा तीर्थयात्रा में भी आपनी जिह्वा को काबू में ना रखते हुए अपने चटोरेपन को हावी होने देते हैं!
    वर्ष में एकाध बार हम मेसे अधिकतर लोग तीर्थयात्रा करने,देवदर्शन करने सपरिवार अथवा मित्रों,सगे सम्बन्धियों के साथ निकलते हैं।अच्छी बात है।हमें ऐसी यात्रा पर जाना ही चाहिए। किन्तु क्या वास्तव में हम ये पवित्र भावना लेकर निकलते हैं और उसे पूरा करते हैं?
     मुझे माफ़ करें,लेकिन हक़ीक़त ये हैं कि हम मेसे अधिकाँश लोग तीर्थयात्रा की आड़ में अपने चटोरेपन की भूख शांत करते रहते हैं और पूण्य कमाने की बजाय पापकर्मों के भागी बनते हैं।तीर्थस्थानों पर बनी भोजनशाला के खाने पर हम नाक-भौं सिकोड़ते हैं,जबकि सच तो ये है कि तीर्थस्थलों का खाना,भगवान का प्रसाद होता है और अतुलनीय होता है।जबकि हम उसका तिरस्कार कर,बाहर मिलने वाली पानीपूरी, पावभाजी,वडापाव,सोडा-शर्बत-शिकंजी पर ऐसे टूट पड़ते हैं जैसे बरसों से कोई हमें ज़बरदस्ती आयम्बिल करवा रहा हो और आज ही ये चटपटा खाने को मिल रहा हो!तीर्थस्थानों के बाहर इन स्टॉलों पर हम भक्ष्य-अभक्ष्य का विचार किये बिना,रात और दिन का ध्यान किये बिना,बिना छने,बासी पदार्थों का आँख बंद कर चटखारे लेलेकर उपभोग करते हैं!क्या इससे हमें तीर्थयात्रा का लाभ मिल पाता है?अरे,हम शहरों में रहते हैं और बारह महीनों वहां रात-आधी रात,भक्ष्य-अभक्ष्य खाते ही हैं,तो फिर कमसेकम तीर्थस्थलों पर तो क्या हमें अपने चटोरेपन पर काबू नहीं रखना चाहिए?
     तीर्थयात्रा का तो असली आनंद तब है,जबकि हम भगवानजी के दर्शन-सेवापूजा करें, वहां की भोजनशाला में भोजन को प्रसाद मानकर ग्रहण करें,और यात्रा के दौरान गाँवों में अपने किसी ज़रूरतमंद साधर्मिक भाई की गुप्त रूप से,बिना प्रचार किये,स्नेह पूर्वक किसी रूप में सहायता कर आएं,या फिर किसी भी ज़रूरतमंद प्राणिमात्र को मदद करदें! तीर्थयात्रा पर निकले हैं तो मौज़-मज़ा-पिकनिक-चटोरेपन को एक तरफ रखिये और धर्म को सही रूप में चरितार्थ कीजिए।
     भगवान् आखिर भगवान् है,और उसके नाम पर हम जो भी कर रहे हैं,उस पर सतत उसकी नज़र है!अब ये हम पर है कि हम पूण्य कमाएं या पापकर्म करें!
अपन ने जो सोचा-समझा,आपको बता दिया।अब आपको ठीक लगे तो आप भी इस पर विचार करें।मैं और ज्यादा कुछ बोलूंगा तो फिर आप ही बोलोगे कि बोलता है !

-----------------------------------------------------------------------------------------------
लेखक- अशोक पुनमिया
लेखक-कवि-पत्रकार 
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'

No comments:

Post a Comment