हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है-6
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भगवान को ''लेनदेन'' से क्या ''लेनादेना?''
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मित्रों मिच्छामी दुक्कड़म। शुरुआत में ही मिच्छामी दुक्कड़म इसलिए,क्योंकि मैं जानता हूँ कि मेरेे इस लेख को पढ़कर *कईयों की त्योंरियां चढ़ जाने वाली है,कईयों को गुस्सा आजाने वाला है,कईयों की मुट्ठियाँ तन जाने वाली हैं!*लेकिन वे सब मुझे क्षमा करें,और ठन्डे दिमाग से सोचने की कृपा करें।
चातुर्मास चल रहा है।अपने -अपने सामर्थ्यानुसार लोग धर्मध्यान में व्यस्त है।हम भी इस बात की तहेदिल से अनुमोदना करते हैं।उधर दूसरी तरफ धनबल का भी जोर है।जाजम पर बैठ कर बोलियाँ बोली जा रही है।हमें बोलियों से परहेज नहीं,वे धर्म से सम्बंधित व्यवस्थाएं करने के लिए ज़रूरी भी है।किन्तु दुःख इस बात का है कि बोलियों को धर्म का पैमाना बनाया जा रहा है!बोली लेने वालों को भाग्यशाली,पुण्यशाली की उपमाएं दी जा रही है,और वहां जाजम पर दर्शक बना बैठा अन्य साधर्मिक अपने आप को दुर्भाग्यशाली, पापी समझ कर पछतावा कर रहा है! वो साधारण साधर्मिक भाई, जिसकी अंटी में इतना पैसा नहीं है,कि वो जाजम पर आगे बैठ कर होड़ाहोडी कर सके,अपने आप को दीन-हीन समझने को मज़बूर है! क्या धर्म की जाजम पर ऐसा दृश्य शोभा देता है? क्या ये धर्म की मूल भावना के अनुकूल भी है?
पैसों की बरसात कर के ही अगर भगवान् की सेवा-पूजा करने वाला ही पुण्यशाली-भाग्यशाली है, तो फिर बाकी के कौन है? क्या भगवान् की नज़र मैं भी ऐसा ही भेदभाव है,कि जो मेरा चढ़ावा ले,वो भाग्यशाली मेरा ख़ास और बाकी के सब दुर्भाग्यशाली है? ये सोच किसने विकसित की?
तीर्थंकरों के चरित्र और धर्म के मूल को समझे तो धर्म के तराज़ू पर धन नहीं कर्म तोला जाता है।पुण्यशाली और भाग्यशाली का निर्धारण कर्मों से ही संभव है।अगर धन से ही कोई पुण्यशाली और भाग्यशाली होता तो दुनिया के सारे तस्कर,डॉन,और दो नंबरी कारोबारी ही पुण्यशाली-भाग्यशाली और भगवान् के अत्यधिक करीब होते,क्योंकि चढ़ावे में उनसे आगे आखिर कौन जाता!
सत्य तो ये है कि बेईमानी के दस रुपये भगवान को चढाने से तो अच्छा है कि ईमान और भावों से भरे मन से भगवान् की प्रार्थना करली जाए! भगवान् को चढ़ावे से खुश करने की मानसिकता और उसका महिमामंडन,दरसल भगवान् को एक सरकारी कर्मचारी के बराबर खड़ा करने के पाप के समान ही है,क्योंकि चढ़ावे से तो सरकारी दफ्तरों में ही काम होते हैं,भगवान् के सम्मुख नहीं। भगवान् के लिए तो भावों से भरा होना ही पर्याप्त है।
मैं बचपन से देखता आ रहा हूँ,कि जाजम पर बैठ कर भगवान् का खासमखास,नजदीकी होने की होडाहोड में चंद संपन्न लोग ही बाज़ी मारते हैं और बाकी के साधर्मिक,जो अपेक्षाकृत चाहे जितने ज्यादा धर्म के ज्ञाता हो,तीर्थंकरों के प्रति भावों से भरे उपासक हो,अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण ठन-ठन गोपाल बने,मन मसोस कर बैठे रह जाते हैं! तिर्थंकरों के दरबार में,धर्म की ज़ाज़म पर हम मेसे ही किसी के द्वारा किया गया ये कैसा न्याय है? अवश्य ही ये सिस्टम ना तो तीर्थंकरों द्वारा बनाया गया होगा और ना ही ज्ञानी साधू भगवंतों द्वारा! ये इज़ाद धनबलियों द्वारा ही की गई होगी जिसे हमने भी स्वीकार कर लिया,बिना ये देखे कि धर्म की मूल भावना क्या है! हमारे धर्म में त्याग की भावना सर्वोच्च है,क्या धर्म की खातिर धन खर्च करते हुए,"नाम" का त्याग नहीं कर सकते? क्या ये संभव नहीं है कि कोई सुसम्पन्न-समृद्ध कभी कभार ऐसा भी करे कि चढ़ावा तो वो बोले और लाभ किसी ऐसे साधर्मिक को दे जो सच्चा धार्मिक प्रवृत्ति का तो है,लेकिन उसमें बोली बोलने का सामर्थ्य नहीं है।इससे दोहरा लाभ मिलता है।आपने धर्म की खातिर खर्चा किया तो आपको ये लाभ् तो मिला,साथ ही आपने त्याग की भावना से किसी सदसाधर्मिक को इसका लाभ दिया,तो आपको बोनस के रूप में भी तो इसका लाभ मिलेगा ही ! बेशक ये आज संभव प्रतीत नहीं हो रहा, किन्तु धर्म की अच्छी समझ और प्रभु के प्रति सच्ची लगन,इस परम्परा का उदय कर सकती है।जो लक्ष्मीपुत्र वास्तव में सच्चे मन से धर्म के लिए कुछ खर्च करना चाहता है,तो उसके मन में फिर नाम की लालसा क्यों होनी चाहिए?ये मैं नहीं कहता,ये तो निति,धर्म और साधू भगवंत भी कहते हैं।और अगर भावना ये है कि धर्म के नाम पर खर्च तभी किया जाए जबकि करने वाले का नाम हो,तो फिर मुझे क्षमा करें,ये धर्म नहीं स्वार्थ है,जिसे धनबल पर धर्म का जामा पहनाया जा रहा है!सवाल खड़ा हो सकता है,बल्कि हमेशा ही खड़ा किया ही जाता है,और गज़ब की बात ये कि अच्छे-अच्छे विद्वानों-आगेवानों द्वारा खड़ा किया जाता है कि नाम नहीं होगा तो पैसे कौन खर्च करेगा! विरोधाभास देखिये, नाम धर्म का लेना है और काम स्वार्थ का करना है,और इसमें हम सभी की मौन सहमति भी है!
निवेदन इतना ही है कि विश्व के इस सर्वश्रेष्ठ, हमारे जैन धर्म को इसकी मूल भावना के अनुसार बचाईये और बढाइये, ताकि आने वाली पीढ़ियों का हर एक साधर्मिक बंधू इस पर गर्व कर सके,इसमें बढ़चढ़ कर भाग ले सके,धर्म को पूर्ण समझ और समर्पण के साथ करते हुए उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए उसके मूल और सर्वश्रेष्ठ रूप में आगे ले जा सके।
अपन ने जो सोचा-समझा,आपको बता दिया।अब आपको ठीक लगे तो आप भी इस पर विचार करें।मैं और ज्यादा कुछ बोलूंगा तो फिर आप ही बोलोगे कि बोलता है !
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लेखक- अशोक पुनमिया
लेखक-कवि-पत्रकार
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'
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