हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है-5
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साधर्मिक को ऊपर उठाओ,
एक और एक ग्यारह बन जाओ।
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बुद्धि से खूब काम ले लिया।अब विवेक जागृत करने का समय आ गया है।अब विवेक से काम लेने की ज़रुरत है।संथारा पर रोक के राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ हमारी एकजुटता अभूतपूर्व रही है।ये एकता दिनोंदिन मज़बूत होनी चाहिए क्योंकि संगठन में ही शक्ति है।
कहने को हमारा जैन समाज सर्वाधिक समृद्ध-सम्पन्न समाज है,जहां पर धन-धान्य,परोपकार की कोई कमी नहीं हैं।किन्तु ये आधा सच ही है।आज भी हमारे समाज में कईं साधर्मिक भाई-बहन अत्यंत गरीबी में,दुःख भरा जीवन काटने को अभिशप्त है! ये स्थिति तब है,जबकि हमारा समाज अन्य लोगों एवं प्राणी मात्र के लिए करोड़ों रुपये खर्च करता है,उनके अभाव दूर करता है!क्या हमारे समाज को पहले अपने समाज की,अपने साधर्मिकों की चिंता नहीं करनी चाहिए? क्या उनको सक्षम बनाने,उनको समृद्ध,खुशहाल और सम्पन्न बनाने के लिए अपनी ताकत नहीं झोंकनी चाहिए? हमारे ही साधर्मिक भाई-बहन भुखों मरे,बिना इलाज़ के मर जाएँ,दरिद्रता में जीवन यापन करे और हम शादी-ब्याह,मौत-मरगत,सामुहिक भोज-प्रदर्शन पर अनाप शनाप खर्च कर जैन धर्म के जयकारे लगाते रहें तो क्या ये न्याय संगत और प्रभु महावीर के बताए मार्ग के अनुरूप होगा? आज समय आ गया है कि हम अपनी अंतरात्मा से ये सवाल करें,और गहराई में उतर कर,ध्यान से इसका उत्तर सुनें,उस पर चिंतन-मनन करें।
जैन समाज सही रूप में तभी संपन्न-समृद्ध होगा,जबकि हर समृद्ध-संपन्न जैनी अपने भाई-बहन और अपने साधर्मिक के दुःख-दर्द में सहभागी बनेगा,उसे उससे उबारेगा,उसे एक व्यवस्थित प्लान के तहत अपने पैरों पर खड़ा होने में लिए दिल से मदद करते हुए उसे भी समृद्ध,खुशहाल और संपन्न बना देगा।भगवान महावीर के अनुयायियों के लिए ये बिलकुल भी कठिन काम नहीं है,क्योंकि उसकी कृपा से इस समाज के पास साधनों का कोई भी अभाव नहीं है।
तो आईये,हम बुद्धि के साथ-साथ विवेक को भी जागृत करें और ज़रूरतमंद साधर्मिकों का हाथ थाम कर उन्हें भी सर उठा कर जीने के काबिल बनाएं।आखिर हमारी शोभा भी सकल समाज से ही है,तो समाज में कोई भी दुखी-परेशान-दरिद्र क्यूँ रहे!
अपन ने जो सोचा-समझा,आपको बता दिया।अब आपको ठीक लगे तो आप भी इस पर विचार करें।मैं और ज्यादा कुछ बोलूंगा तो फिर आप ही बोलोगे कि बोलता है !
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लेखक- अशोक पुनमिया
लेखक-कवि-पत्रकार
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'
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