Thursday, 15 September 2016

हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है-12
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ठूंस-ठूंस कर खाते हुए 'महावीर' को कैसे समझेंगे?
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     चातुर्मास चल रहा है।गुरु भगवंतों के सानिध्य में ज्ञानार्जन अपने चरम पर है।गुरु मुख से झरते ज्ञान पुष्पों का गुलदस्ता अपने जीवन में लगा कर पूरा जीवन हम सुवासित कर सकते हैं।बहुत से जागरूक श्रावक गुरु सानिध्य में अपना जीवन धन्य कर रहे हैं। 
     चातुर्मास दरम्यान ऐसे कईं मौके आते हैं जबकि समाज का सामूहिक भोज (गाम जीमण) आयोजित होता है।इन 'गाम जीमण' में कितना खाना झूठन के रूप में अनुपयोगी हो जाता है,इस बात को छोड़ भी दें,तो विचारणीय बिंदु ये है कि क्या 'गाम जीमण' चुनिंदा 8-10 आइटमों के साथ संपन्न नहीं हो सकता? ये तथ्य है कि खाने के आइटम जितने ज्यादा होते हैं, खाने वाला सभी आईटम का 'टेस्ट' लने के चक्कर में ज़रुरत से ज्यादा खाता है और झूठन के रूप में बर्बाद भी करता है।जहां एक ओर ज़रुरत से ज्यादा खाना खुद के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करना है,वहीं झूठा छोड़ना तथा अन्न को बर्बाद करना हमारे धर्म के विरुद्ध, तथा महापाप भी है।मुझे माफ़ करे,लेकिन खेद की बात है कि ये दोनों ही काम हम जम कर कर रहें हैं,पुरे होशोहवास में कर रहे हैं और भगवान महावीर के दर्शन की धज्जियां उड़ाते हुए कर रहे हैं!
     हमारे गुरुभगवंत और बहुत से तपस्वी मात्र उतना ही खाते हैं,जितने की शरीर को आवश्यकता हैं।क्यों? क्योंकि उन्होंनें भगवान् महावीर के दर्शन को समझा है,उसे जीवन में उतारा है।दूसरी तरफ हम है जो ठूंस-ठूंस कर खाकर दुनियां भर की व्याधियों से ग्रसित भी हो रहे हैं और कहीं ना कहीं दुनिया में जहां भी भूखमरी है,उसके लिए एक हद तक पाप के भागी भी बन रहे हैं!अपरिग्रह के सिद्धांत पर विश्वास करने वाला 'जैन',पेट में भी 'परिग्रह' से नहीं चुके,तो ये सोचने की बात है!
     सामूहिक भोजों (गाम जीमण) में बनने वाले पचासों पकवानों को तिलांजलि देकर,अर्थात मात्र 8-10 आइटम तक का उपयोग कर,उस बचे धन का सदपयोग जीवदया में करके हम अपने धर्म की पालना बेहतर ढंग से कर सकते हैं,दुनियां में व्याप्त भुखमरी को कम करने में परोक्ष रूप से अपना सहयोग दे सकते हैं।कम आइटम होने से झूठा छोड़ने की भी संभावना नहीं के बराबर होती है,जिससे हम अन्न के अपमान से भी बचते हैं।
     अब समय आ गया है कि हम सभी सामूहिक रूप से इन मुद्दों पर चिंतन करें और कोई सार्थक पहल करें।
    अपन ने जो सोचा-समझा,आपको बता दिया।अब आपको ठीक लगे तो आप भी इस पर विचार करें।मैं और ज्यादा कुछ बोलूंगा तो फिर आप ही बोलोगे कि बोलता है !

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लेखक- अशोक पुनमिया
लेखक-कवि-पत्रकार 
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'

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