हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है-11
-------------------------------------------
-------------------------------------------
'प्रभावना' के लिए ये कैसी 'भावना' ?
चातुर्मास चल रहा है।पूज्य साधू-संतों के प्रवचनों का धर्मशालाओं में सामूहिक रूप से,शान्ति पूर्वक श्रवण कर हम अपने धर्म को गहरे अर्थों में समझ रहे हैं।ये समय पूज्य साधू-संतों के सानिध्य में रह कर ज्ञानार्जन करने और अपने विवेक को जागृत करने का है,जिसका हम सभी लाभ उठा रहे हैं।
पूज्य साधु-संतों के प्रवचन हम जितने धैर्य और शान्ति से सुनते हैं,प्रवचनों के बाद उतनी ही हमारी अधीरता बढ़ जाती है! इस ओर हमारे पूज्य साधू-संत भी समय-समय पर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं,किन्तु अफ़सोस कि हम उस पर गंभीरता से गौर नहीं करते और अपनी करनी से स्थिति को चिंतनीय एवं हास्यास्पद बनाते रहते हैं!
प्रबुद्ध पाठकगण मेरा इशारा समझ गए होंगे।मैं बात कर रहा हूँ 'प्रभावना' की।
आज भी अपवादों को छोड़ कर प्रायः हर उस जगह,जहां प्रभावना बँट रही हो,हमारी अधीरता देखने लायक होती है!चौंकाने वाली बात ये है कि इस जगह आकर पैसे वालों और साधारण लोगों का भेद मिट जाता है! मैंने प्रभावना में 'पड़ा-पड़ी' और 'मारामारी' बिना किसी भेदभाव के देखी है! रूखी-सूखी खाने वालों से लेकर,खड़े-खड़े सैकड़ों रुपये उड़ा देने वालों को भी प्रभावना में समान रूप से अधीर होते हुए मैंने देखा है! शायद आपके ज़ेहन में भी इस तरह के दृश्य सहज़ ही इस वक़्त ताज़ा हो रहे होंगे,क्योंकि ये दृश्य आम है।
क्या ये हमारे लिए शर्म की बात नहीं है? हमारे समाज की गिनती समृद्ध,संपन्न और सुशिक्षित समाजों में होती है।दान-पूण्य और जन-जन के लिए निःस्वार्थ रूप से,दिल खोलकर मुक्त हस्त से धन खर्च करने में हमारा कोई सानी नहीं है।फिर क्या कारण है कि हम 5-10-50-100 रुपये की 'प्रभावना' लेने के लिए अपनी बारी का संयम और शान्तिपूर्वक इंतज़ार करने के बजाय अधीर हो उठते हैं तथा धक्कामुक्की पर उतर आते हैं? प्रभावना का 'लिफाफा' लेने के लिए सबसे आगे निकल जाने और पूरी लंबाई में हाथ फैलाने का कारनामा हम ऐसे करते हैं जैसे कि हम कोई 'सरकारी खैरात' लूटने लाइन में लगे हैं और अगर छीन-झपट कर जल्दी नहीं लेली तो ख़त्म हो जाएगी और हम पीछे रह जाएंगे! क्या ये व्यवहार हमें शोभा देता है?
इस चातुर्मास पर हमें इस बात पर अवश्य गौर करना चाहिए और प्रभावना लेने में अपनी अधीरता वाली आदत को सुधारना चाहिए,क्योंकि इसमें हमारे समाज के संस्कार झलकते हैं,तथा अन्य लोगों में हमारी एक छवि बनती है।
तो आईये हम आज और अभी से ये तय करलें कि जहां भी प्रभावना वितरित हो रही होगी हम बिना अधीर हुए संयम और शान्ति से अपनी बारी का इंतज़ार करेंगे और मान-सम्मान के साथ प्रभावना ग्रहण करेंगे।आखिर हम प्रभु महावीर की सन्तान है जिन्हें समृद्धि-सम्पन्नता का वरदान है।फिर ऐसी अधीरता के अधीन भला हम क्यों रहें!
अपन ने जो सोचा-समझा,आपको बता दिया।अब आपको ठीक लगे तो आप भी इस पर विचार करें।मैं और ज्यादा कुछ बोलूंगा तो फिर आप ही बोलोगे कि बोलता है !
-----------------------------------------------------------------------------------------------
लेखक- अशोक पुनमिया
लेखक-कवि-पत्रकार
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'
No comments:
Post a Comment