Saturday, 30 July 2016

हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है-1
-------------------------------------------

एक अंगुली साधू -सन्तों की तरफ और बाकी तीन ?

------------------------------------------------------------

निवेदन: इस आलेख को कृपया वे ही बंधू पढ़ें जो सत्य से मुठभेड़ करने का हौसलारखते हो।कुछ कड़वी बाते कईयों का हाज़मा खराब कर सकती है,अतः आलेख की तरफ वही बढ़ें जो सत्य को पचाने की ताक़त रखते हो।



     कहते हैं कि हम एक ऊँगली किसी की तरफ करते हैं तो बाकी की तीन अंगुलियां स्वयं हमारी तरफ होती है! लेकिन हमें इसका भान ही नहीं है!

    आजकल साधू भगवंतों पर ऊँगली उठाना एक फैशन सा बन गया है।आज हम अपने पूजनीय साधू भगवंतों का त्याग,समर्पण,कठोर जीवन कम देखते हैं,उनसे धर्म का मर्म कम समझते हैं और उनकी तथाकथित कमजोरियों की जासूसी कर उसका भंडाफोड़ कर हीरो बनने का पराक्रम ज्यादा कर रहे हैं!हम ये भूल रहें हैं कि हम जिनकी कमजोरियों को ढूंढ कर हीरो बनजाने की तलाश में हैं,वे हर स्थिति में हमसे बेहतर हैं और उनके गुणों के शतांश तक भी पहुँचने की काबिलियत हमारी नहीं है!

    साधू भगवंतों का त्याग,समर्पण और कठोर जीवन हमारे सामने है,उसकी बराबरी दुनिया में शायद ही कोई और करपाता होगा।अपवाद आखिर कहाँ नहीं होते? समग्रता को छोड़ कर अपवादों को पकड़ना,मूर्खता की पराकाष्ठता नहीं तो और क्या है?99 अच्छाईयों का ज़िक्र छोड़कर,1 बुराई की चर्चा में डूब जाना,चुल्लू भर पानी में डूब मरने से अलग क्या है?साधू भगवंतों की तरफ एक अंगुली करके बाकी की तीन अँगुलियों का निशाना हम स्वयं होते हैं,क्या उस पर हमारा ध्यान जाता है?

    पाट पर बिराजमान साधुभगवंतों के सामने निचे ज़ाज़म पर ठसक कर बैठने वाले श्रावकों की पोल क्या साधू भगवंत मीडिया में खोलते हैं? कड़काकडक कपड़ों में टनाटन हो कर साधू भगवंतों के सामने बिराजने वाले हम श्रावकों मेसे आखिर कितने होंगे जो श्रावक धर्म की पूर्ण पालना करते होंगे?श्रावक होने का दम भरने वाले हम अगर अपनी जमात को टटोल दें तो मुश्किल से दशमलव एक प्रतिशत मिलेंगे, जो पूर्णतया श्रावक धर्म की पालना करते होंगे! दूसरी तरफ है पूजनीय साधू भगवंत,जिनमें मुश्किल से दशमल एक प्रतिशत होंगे जो जाने-अनजाने साधू धर्म से भटकते होंगे!तो फिर हम आखिर किस मुंह से अपने साधू भगवंतों में दिखने वाले अपवादों को सरेआम उछालते हैं? क्या जैसे साधू भगवंत अपने नियमों से बंधे हैं,और जाने अनजाने उन नियमों की अवहेलना से हमें एक बखेड़ा खड़ा करने का मौक़ा मिल जाता है,वैसे ही हम श्रावक क्या किसी नियमों से बंधे नहीं है?और उन नियमों की रोज रोज,सरेआम,और आगेवान बनकर,चकाचक-कड़काकडक धवल कपडे पहन कर, बगुलाभक्त बनकर धज्जियां उड़ाने के बाद भी क्या कोई बखेड़ा खड़ा करता है? नहीं,तो क्यों? क्या साधू भगवंत संघ पर आश्रित है इसलिए जाने-अनजाने कुछ भी गलती होते ही उनको सरेआम बेइज्जत करना शुरू कर देना चाहिए? एक बार,सिर्फ एक बार हम श्रावक अगर ,साधू भगवंतों को बेइज्जत करने से पहले ,अपने गिरेबां में झाँक लें तो वहां इतने छेद नज़र आएंगे कि हम खुद सेही नज़र मिलाने से भी कतराने लगेंगे! साधू-संतों के पीले-धवल वस्त्रों पर दाग ढूंढने से पहले हमें अपने चकाचक, कड़काकडक, टनाटन, धवल वस्त्रों के निचे छुपी भीषण कालिख को देखना होगा और साधू भगवंतों के गुणों से शतांश ही सही,लेने की कोशिश करनी होगी,तभी हम जैन धर्म और समाज को कुछ दे पाएंगे. हमारे साधू भगवंत तो महावीर की वाणी को जीवन में उतार कर अपना जीवन जीते हैं,और हम श्रावक भगवान् महावीर की वाणी को ज़ाज़म पर बैठ कर सुनने तक ही सिमित है!किसी को इस पर संशय हो तो ज़रा अपने दिल पर हाथ रख कर अभी पूछ ले,प्रत्युत्तर मिल जाएगा!

    हमारा साधू समुदाय बहुत ज्ञानी,विवेकशील है और उनके समुदाय में अगर कहीं कुछ जाने-अनजाने गलत होता है तो वे अपने स्तर पर उससे निपटने की क्षमता भी रखते हैं।संघ भी ऐसी बातों को उनके संज्ञान में लाकर शान्ति पूर्वक समस्याओं को सुलझा सकता है।घर के मामलों को सरेआम उछालने से धर्म और समाज का क्या भला हो सकता है?

साधू भगवंत तो अपनी आत्मा के साथ साथ पुरे समाज का कल्याण करने के प्रयास में जुटे रहेंगे ही और हम कीचड़ में खड़े रह कर कमल पर पत्थर फैंकने का पराक्रम कर खुद ही कीचड़ में धँसते चले जाएंगे,जिसे बचाने वाला शायद ही कोई होगा!
    अपन ने जो सोचा-समझा,आपको बता दिया।अब आपको ठीक लगे तो आप भी इस पर विचार करें।मैं और ज्यादा कुछ बोलूंगा तो फिर आप ही बोलोगे कि बोलता है !
(इस आलेख का मकसद किसी भी बंधू को ठेस पहुंचाना नहीं है,फिर भी कुछ कटु कहने में आया हो और किसी के अंतर्मन को ठेस पहुंची हो तो क्षमा याचना,इस आग्रह के साथ कि कृपया इस आलेख पर चिंतन ज़रूर करें।)
-----------------------------------------------------------------------------------------------
लेखक- अशोक पुनमिया
लेखक-कवि-पत्रकार 
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'

No comments:

Post a Comment