Friday, 26 August 2016

हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है-10
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 पर्वाधिराज पर्व 'पर्युषण' में हावी ना हो 'बगुला भगत' का भाव !
         
     पर्वाधिराज पर्व पर्युषण आ रहा है।पर्युषण के दौरान हमारी भक्तिभावना,तप,देव दर्शन,गुरु निश्रा अपने चरम पर होगी।वर्षभर धर्म-कर्म से विमुख रहने वाले भी पर्युषण के दौरान मंदिर-उपाश्रय में बराबर हाज़री दे कर धर्म को समझने-जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे। यानि पवित्र पर्व पर्युषण एक ऐसा मौका हमारे लिए लेकर आता है कि हम कमसे कम आठ दिनों तक तो देव-गुरु के सानिध्य में रह कर,उनके दर्शन-पूजन कर तथा जिनवाणी का श्रवण कर अपने जैन होने को सार्थक कर सकें,अपने धर्म की गहराई को जान-समझ सकें,अपने आचरण में जैनत्व को उतार कर भगवान महावीर के सच्चे अनुयायी बन सकें।
     मुझे क्षमा करें,लेकिन असल सवाल ये है कि क्या ऐसा हो पाता है? क्या पवित्र पर्व पर्युषण को हम सही अर्थों में समझ कर इस पवित्र पर्व का फायदा उठा पाते हैं? याकि इस पवित्र पर्व को भी हम मात्र लकीर पीटते हुए,खुद की पीठ थपथपाते हुए,और खुद को सबसे बड़ा धर्मधुरन्धर साबित करने की होड़ाहोडी में ही गुज़ार देते हैं? सवाल तीखा है,लेकिन मान कर चलिए,इन तीखे सवालों को अंतर्मन से टटोले बिना,इनसे मुठभेड़ किये बिना,इनका उत्तर खोजे बिना पर्वाधिराज पर्व पर्युषण का कोई अर्थ नहीं है! पर्युषण जैसे पवित्र पर्व पर भी अगर हम स्वयं के भीतर नहीं उतरे,अगर धर्म और आडम्बर में फर्क नहीं करते,अगर तीर्थंकरों को अंतर्मन में स्थापित कर जिनेश्वर की आज्ञा के मर्म को नहीं समझते तो फिर क्या पवित्र पर्व पर्युषण और क्या वर्ष के बाकी के दिन! सब दिन एक जैसे!!
     पर्युषण का पवित्र पर्व हमारे जीवन में आमूलचूल सकारात्मक परिवर्तन लाने में पूरी तरह सक्षम है। बस हमें इस पर्वाधिराज पवित्र पर्व पर्युषण के महत्व को समझना होगा।हमें आडम्बर से,ढकोसलों से,दिखावे से बाहर निकल कर,'बगुला भगत' की छवि से मुक्त हो कर,सच्चे मन से पूरी तरह से स्वयं के भीतर उतरना होगा।संतों के श्रीमुख से जिनवाणी का ध्यानमग्न होकर श्रवण करते हुए,तीर्थंकरों को अंतर्मन में स्थापित करते हुये जिनाज्ञा के मर्म को समझना होगा,उसे दैनिक जीवन में आत्मसात करना होगा,और तब जाकर पवित्र पर्व पर्युषण सचमुच सार्थक होगा!
     मैं जानता हूँ कईं बंधुओं को मेरी बातों से ठेस पहुंची होगी।उनसे *मिच्छामि दुक्कड़म* कहते हुए,इतना निवेदन अवश्य ही करूँगा,कि वे गहराई से मेरी बातों पर गौर करे। *सच कड़वा ज़रूर होता है,किन्तु उस छलावे से बेहतर होता है,जो मीठापन का अहसास करवाते हुए कर्मबंधन करवाता रहता है!* मौक़ा भी है और दस्तूर भी! तो आईये,इस बार पर्वाधिराज पवित्र पर्व पर्युषण पर कड़वे सच से रु-ब-रु होते हुए छलावे से बाहर निकले और खुद के भीतर उतर कर पवित्र पर्व पर्युषण में जीवन को धन्य बनाएं।
निवेदन: लेख को अच्छी भावना के साथ लिखा गया है।फिर भी कहीं भी,कुछ भी,जाने-अनजाने जिनाज्ञा विरूद्ध लिखा गया हो,तथा किसी भी भाई-बहन की भावनाओं को ठेस पहुंची हो तो अंतर्मन से मिच्छामि दुक्कड़म।
लेख समझ में आए व उपयोगी लगे तो अपने जैन मित्रों,सम्बन्धियों तथा ग्रुप्स में शेयर करना ना भूलें।
    अपन ने जो सोचा-समझा,आपको बता दिया।अब आपको ठीक लगे तो आप भी इस पर विचार करें।मैं और ज्यादा कुछ बोलूंगा तो फिर आप ही बोलोगे कि बोलता है !

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लेखक- अशोक पुनमिया
लेखक-कवि-पत्रकार 
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'

Saturday, 20 August 2016

हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है-9
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जीवन तो है ही संघर्ष का नाम !
   'क्या आप परेशान है? बिमारी,आर्थिक तंगी, असफलता,घरेलू झगड़े,आपका पीछा नहीं छोड़ रहे?बेटा-बेटी आपकी आज्ञा के विरुद्ध काम करते हैं?पति-पत्नी में झगड़ा होता रहता है?भाई-बहनों से मनमुटाव है?आपसी संपत्ति का झगड़ा है?भाड़े के फ्लेट में रहते हैं? व्यवसाय में अपने दोस्तों-सम्बन्धियों से पीछे रह गए हैं?लड़का-लड़की बड़े हो गए और उनकी शादी नहीं हो रही है?उधारी अटक गई है?नौकरी कर रहे हैं?अगर आप भी इनमेसे किसी एक या अनेक समस्याओं से ग्रस्त हैं और उनका समाधान चाहते हैं तो हमसे सम्पर्क करें।'
     इस तरह के तमाम विज्ञापन हमारे सामने तकरीबन रोज ही आते रहते हैं,जिनमें कईं 'ज्ञानीजन' तरह तरह के उपाय भी इन समस्याओं के हमें सुझाते हैं।इतना ही नहीं,हमारे आसपास के कईं मिलने वाले भी इन समस्याओं को दूर करने के बहुत से अज़ीबोगरीब रास्ते दिखाते हैं,जिनकी कोई विश्वसनीयता ही नहीं होती! कमाल देखिये कि ऊपर बताई गई समस्याओं मेंसे एक या अनेक हम मेंसे हर एक के जीवन में अवश्य होती ही है।किसी के जीवन में एक,तो किसी के जीवन में अनेक समस्याओं का होना कोई नईं बात नहीं है।नयी बात तो तब होगी,जबकि इस संसार में कोई एक,जी हाँ कोई एक इंसान ऐसा मिल जाए जो कहे कि मुझे किसी तरह की कोई परेशानी नहीं है,कि मेरे पास हर तरह का सुख है।और वास्तव में ऐसा हो भी! क्या ये सम्भव है? क्या जिंदगी मेसे हर तरह के दुःख को निकाल कर सिर्फ सुखों को ही कायम रखा जा सकता है? 
     जी नहीं,ये कदापि संभव ही नहीं है।जीवन तो है ही संघर्ष का नाम,जिसमें तरह-तरह के दुःख, परेशानियां आती ही रहती है।हाँ इसकी मात्रा में अवश्य फर्क हो सकता है।कोई कम दुखी,कम परेशान हो सकता है तो कोई ज्यादा।इन दुखों से,इन परेशानियों से हम बाहर निकलने का,कम करने का प्रयास कर सकते हैं और हमें करना भी चाहिए,जो हम करते भी हैं,किन्तु इसके लिए हमें किसी के बहकावे में आकर गलत मार्ग का चयन कभी नहीं करना चाहिए।पैसे लुटाने से और अंधविश्वासों की राह का पथिक बनने से अगर दुःख-परेशानियां-समस्याएं कम या खत्म हो जाती तो पैसे वालों और अंधविश्वासों का गोरखधंधा चलाने वालों की ज़िन्दगी में कोई दुःख-परेशानी होती ही नहीं और वे दुनिया में सबसे सुखी लोग होते !लेकिन क्या ऐसा है ? ज़रा आप अपने आसपास नज़र घुमा कर देखिये,हक़ीक़त आपको पता चल जायेगी!
     तो फिर आखिर इन तमाम तरह की परेशानियों-समस्याओं-दुखों को दूर करने का तरीका क्या है? तरिका है! तरीका ये है कि अपने तीर्थंकरों को,अपने आराध्य को याद करते हुए स्वयं में आत्मविश्वास, सकारात्मक सोच पैदा की जाए,दुःख और सुख दोनों को ज़िन्दगी का अनिवार्य हिस्सा मान कर सहज स्वीकार किया जाए,खुद दुःख, परेशानियां, समस्याओं से मुकाबला करते हुए भी प्राणी मात्र के दुखों,परेशानियों,समस्याओं को बांटने की भावना रखी जाए तथा दुखों-परेशानियों-समस्याओं को भगाने,दूर करने,कम करने का तथा सुखों को बुलाने का निरंतर पुरुषार्थ करते हुए जीवन बिताया जाए !जी हां,इन उपायों के अलावा और कोई उपाय नहीं है ज़िन्दगी को आराम से जीने का !दुखों,परेशानियों,समस्याओं को भी जीवन का अनिवार्य हिस्सा मानकर ही इनकी पीड़ा को कम किया जा सकता।जिंदगी जीने के लिए हवा का होना ज़रूरी है,लेकिन क्या हवा के झोंकें के साथ उड़कर आने वाले और आँख में घुस जाने वाले कचरे को रोका जा सकता है?जीने के लिए पानी का होना ज़रूरी है,लेकिन क्या सौ प्रतिशत शुद्ध और क्रिस्टल क्लियर पानी की ही उम्मीद कभी पूरी हो सकती है?जीने के लिए खाना आवश्यक है,किन्तु क्या बिना मिट्टी/घासपूस/कचरे के अनाज पैदा किया जा सकता है? तो फिर ज़िन्दगी से सिर्फ सुखों की ही उम्मीद क्यों?
     ज़िन्दगी में कचरा,मिट्टी,घासपूस की तरह दुःख, परेशानियां,समस्याएं भी आती ही रहेगी,इन्हें दूर करते रहिये......फिर आएगी......फिर दूर कीजिए......फिर आएँगी......फिर दूर कीजिये ! ज़िन्दगी जीने का इससे बेहतर,सलीकेदार और सच्चा तरीका दुसरा है भी नहीं!
     अपन ने जो सोचा-समझा,आपको बता दिया।अब आपको ठीक लगे तो आप भी इस पर विचार करें।मैं और ज्यादा कुछ बोलूंगा तो फिर आप ही बोलोगे कि बोलता है !

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लेखक- अशोक पुनमिया
लेखक-कवि-पत्रकार 
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'

Wednesday, 17 August 2016

हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है-8
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तीर्थयात्रा और चटोरापन !

    
     तीर्थयात्रा और चटोरेपन में यूँ तो कुछ भी सामंजस्य नहीं है,किन्तु हमने इसमें भी मेल कर रखा है,तथा तीर्थयात्रा में भी आपनी जिह्वा को काबू में ना रखते हुए अपने चटोरेपन को हावी होने देते हैं!
    वर्ष में एकाध बार हम मेसे अधिकतर लोग तीर्थयात्रा करने,देवदर्शन करने सपरिवार अथवा मित्रों,सगे सम्बन्धियों के साथ निकलते हैं।अच्छी बात है।हमें ऐसी यात्रा पर जाना ही चाहिए। किन्तु क्या वास्तव में हम ये पवित्र भावना लेकर निकलते हैं और उसे पूरा करते हैं?
     मुझे माफ़ करें,लेकिन हक़ीक़त ये हैं कि हम मेसे अधिकाँश लोग तीर्थयात्रा की आड़ में अपने चटोरेपन की भूख शांत करते रहते हैं और पूण्य कमाने की बजाय पापकर्मों के भागी बनते हैं।तीर्थस्थानों पर बनी भोजनशाला के खाने पर हम नाक-भौं सिकोड़ते हैं,जबकि सच तो ये है कि तीर्थस्थलों का खाना,भगवान का प्रसाद होता है और अतुलनीय होता है।जबकि हम उसका तिरस्कार कर,बाहर मिलने वाली पानीपूरी, पावभाजी,वडापाव,सोडा-शर्बत-शिकंजी पर ऐसे टूट पड़ते हैं जैसे बरसों से कोई हमें ज़बरदस्ती आयम्बिल करवा रहा हो और आज ही ये चटपटा खाने को मिल रहा हो!तीर्थस्थानों के बाहर इन स्टॉलों पर हम भक्ष्य-अभक्ष्य का विचार किये बिना,रात और दिन का ध्यान किये बिना,बिना छने,बासी पदार्थों का आँख बंद कर चटखारे लेलेकर उपभोग करते हैं!क्या इससे हमें तीर्थयात्रा का लाभ मिल पाता है?अरे,हम शहरों में रहते हैं और बारह महीनों वहां रात-आधी रात,भक्ष्य-अभक्ष्य खाते ही हैं,तो फिर कमसेकम तीर्थस्थलों पर तो क्या हमें अपने चटोरेपन पर काबू नहीं रखना चाहिए?
     तीर्थयात्रा का तो असली आनंद तब है,जबकि हम भगवानजी के दर्शन-सेवापूजा करें, वहां की भोजनशाला में भोजन को प्रसाद मानकर ग्रहण करें,और यात्रा के दौरान गाँवों में अपने किसी ज़रूरतमंद साधर्मिक भाई की गुप्त रूप से,बिना प्रचार किये,स्नेह पूर्वक किसी रूप में सहायता कर आएं,या फिर किसी भी ज़रूरतमंद प्राणिमात्र को मदद करदें! तीर्थयात्रा पर निकले हैं तो मौज़-मज़ा-पिकनिक-चटोरेपन को एक तरफ रखिये और धर्म को सही रूप में चरितार्थ कीजिए।
     भगवान् आखिर भगवान् है,और उसके नाम पर हम जो भी कर रहे हैं,उस पर सतत उसकी नज़र है!अब ये हम पर है कि हम पूण्य कमाएं या पापकर्म करें!
अपन ने जो सोचा-समझा,आपको बता दिया।अब आपको ठीक लगे तो आप भी इस पर विचार करें।मैं और ज्यादा कुछ बोलूंगा तो फिर आप ही बोलोगे कि बोलता है !

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लेखक- अशोक पुनमिया
लेखक-कवि-पत्रकार 
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'