Friday, 8 September 2017

सुकून अभी बाकी है !

हम जाने-अनजाने कहीं अपने साधर्मिक बंधुओं,बच्चों और नई पीढ़ी को अपने धार्मिक संस्कारों से दूर करने का पाप तो नहीं कर रहे हैं ??

हर जैन भाई-बहन को ये वीडियो एक बार जरूर देखकर आत्म मंथन करना चाहिए।

Wednesday, 16 August 2017


खैरात  में  नहीं  मिली   है  स्वतन्त्रता  !




Tuesday, 8 August 2017

सुकून अभी बाकी है !

माता-पिता को समर्पित एक विडिओ जो लोगों के विचार बदल सकता है !



Tuesday, 4 July 2017

हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है-19
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चातुर्मास : "धर्मध्यान" और "समाजध्यान" दोनों हो 
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   चातुर्मास निकट आ रहा है।जगह जगह धूमधाम से वंदनीय महाराज साहेब के प्रवेश हो रहे हैं।प्रतिदिन गुरुओं के मुखारविंद से प्रवचन श्रवण करने का सुअवसर मिलेगा,अपनी अपनी सामर्थ्यानुसार सभी बंधू धर्मध्यान में रत हो कर दान-पुण्य कर चातुर्मास को सार्थक करेंगे। कमोबेश हर वर्ष ऐसा ही होता है और पुरा समाज इस दरम्यान एकजुट हो सामूहिक रूप से धर्माराधना करता है।इससे हमारे संस्कार,धर्म भावना मज़बूत होती है,नयी पीढ़ी को अपने समाज,धर्म को और भी बेहतर तरीके से जानने-समझने का मौक़ा मिलता है।
   बदलते वक़्त में हमें इस मौके पर एक और चौका लगाने की ज़रूरत है।वो है "धर्मध्यान" के साथ ही साथ "समाजध्यान" की भी अनिवार्य रूप से शुरुआत की जाए।हमारा धर्म जितना श्रेष्ठ है,कहते हुए तकलीफ होती है,लेकिन उतना ही हमारा समाज आज आडम्बर,दिखावे और गलत परम्पराओं का शिकार भी है! धर्म और समाज में जबरदस्ती घुसा दी गई आडम्बर-दिखावे की प्रवृति और कुछ मुर्ख हेकड़ीबाज़ लोगों की सनक ने आज विश्व के सर्वश्रेष्ठ धर्म के अनुयायिओं को अपने समाज के बारे में गहनता से चिंतन करने को विवश कर दिया है!बात चाहे धार्मिक अनुष्ठानों को हो या विवाह, मृत्यु,जन्मदिन, जैसे ना गिने जा सकने वाले अनंत सामाजिक आयोजनों की, दिखावे, आडम्बर और चन्द लोगों के सनकीपन ने इन सभी को इतना विकृत रूप दे दिया है कि इससे ना केवल हमारे महान धर्म की अवमानना हो रही है,अपितु समाज का ढांचा भी बिखर और बिगड़ रहा है।समाज का आर्थिक रूप से कमजोर हिस्सा इन विकृतियों का सबसे बड़ा शिकार हो कर और ज्यादा कमजोर, ऋणग्रस्त, अवसादग्रस्त हो रहा है और चुपचाप पीड़ा भोग रहा है!
   इधर आजकल हमारे समाज में लगभग अधेडावस्था को प्राप्त हो चुके पति-पत्नी में विभिन्न पर्यटकस्थलों पर घुमते हुए "विचित्र मुद्राओं" और "विचित्र वेशभूषाओं" में, जिन्हें 'बेहूदा' और 'शर्मनाक' कहा जा सकता है, फोटो खिंचवा कर 'फेसबुक,इन्स्टाग्राम और वाट्सएप' जैसे सोशल मीडिया पर डालने का प्रचलन बढ़ चला है! इस उम्र में हीरो-हिरोइन सा 'मॉड' दिखने की लालसा ने बेशर्मी की सारी हदें जैसे पार कर ली है,और लोग शर्मिंदा होने की बजाय 'एक दुसरे का अनुसरण' करने में लगे हैं! ये सरासर अपने संस्कारों का हनन है,जिसे समझ कर स्व विवेक से नहीं रोका गया तो आने वाली पीढ़ी को हम कैसे और क्या संस्कार दे पायेंगे?
   ये बातें कोरी मज़ाक या लफ़्फ़ाज़ी भर नहीं है,बल्कि वो कटु सत्य है,जो समाज के हर चिंतक-शुभचिंतक की नज़र में है, और वो सहज ही उसे देख पा रहा है,किन्तु ना जाने किस मजबूरीवश मौन हैं! क्या हमारे समाज के लक्ष्मीपुत्रों-सुसम्पन्न बंधुओं और साधू-संतों का ये दायित्व नहीं बनता है कि वे चातुर्मास में "धर्मध्यान" के साथ-साथ "सामाजध्यान" के ऊपर भी चिंतन-मनन करे और समाज को पुनः धर्म के अनुरूप तथा संस्कारी बनाने में भी अपनी भूमिका का निर्वहन करे? एक मज़बूत,आदर्श,उच्च विचारोंयुक्त,रूढ़िवाद विहीन,स्वधर्म आचरणयुक्त तथा संस्कारित समाज ही अपनी धर्मध्वजा को मज़बूती से थामे रख सकता है,उसे विश्व में चहुँ और फहरा सकता है।
   कुरीतियों,आडम्बरों,दिखावों और कुसंस्कारों से ग्रस्त समाज आखिर अपने धर्म की रक्षा भी कैसे और कब तक कर पायेगा,क्योंकि वहां तो आचरण ही धर्म विरूद्ध है! समाज के आगेवानों को,साधू संतों को, संपन्न लक्ष्मी पुत्रों को इन बातो पर अब गम्भीरता से गौर करना चाहिए और इसी चातुर्मास से "धर्मध्यान" के साथ-साथ "समाजध्यान" को भी अनिवार्य रूप से लागू करना चाहिए।चातुर्मास पर समाज एक जगह इकट्ठा हो कर धर्माराधना करता ही है,प्रवचन सुनता ही है।उसी जगह पर इकट्ठे हुए समाज के लोगों को एक निश्चित समय पर समाज/धर्म में घुस आई तमाम बुराईयों/बीमारियों/कुसंस्कारों को तिलांजलि देने को प्रेरित करते हुए तथा अपने संस्कारों की याद दिलाते हुए अपने समाज,धर्म और संस्कारों की रक्षा की शपथ दिलानी चाहिए और विरोधियों को सवालों के तर्कसम्मत ज़वाब देकर संतुष्ट करना चाहिए। ये आज की ज़रूरत है,क्योंकि धर्म,समाज,संस्कार और भगवान् महावीरके मूल्यों को बचाये रखने के लिए इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है।
   लेखक का मन्तव्य अपने धर्म,संत समुदाय और साधर्मिकों का अपमान करना कदापि नहीं है,बल्कि अपने धर्म और समाज के प्रति अपनी उच्च भावनाओं को अपने बंधुओं के सम्मुख खुले दिल से रखना मात्र  है।बावज़ूद इसके,कहीं पर भी कुछ भी कटु या धर्मविरुद्ध कहने में आया हो,तो अंतर्मन से मिच्छामी दुक्कड़म।
     अपन ने तो आईना दिखा दिया! अब आप चाहें तो इस आईने को तोड़ दें या फिर इसका प्रतिबिम्ब बदल दें! इससे ज्यादा कुछ और बोलूंगा तो फिर आप ही बोलोगे कि बोलता है!
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लेखक- अशोक पुनमिया
लेखक-कवि-पत्रकार-ब्लॉगर 
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया' पाक्षिक 

Friday, 23 June 2017

हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है-18
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आधुनिकता के हवन में संस्कारों की आहुति !
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     एक तरफ अपनी संस्कृति बचाने की बातें की जा रही हैं,वहीं दूसरी तरफ आधुनिकता के नाम पर अपने संस्कारों को तिलांजलि दी जा रहीहै!शर्मोहया,जिसका कि हमारी संस्कृति और संस्कारों में अहम स्थान है,और जिसके गहरे अर्थ भी है, आज दम तोड़ते से लग रहे हैं!

     मुझे क्षमा करें,किन्तु ये आज आम नज़ारा है कि हम अपने समाज की किसी शादी या अन्य समारोह में शिरकत करने जाएं तो वहां मेकप,फैशन,और तथाकथित फोटो सेशन के नाम पर बेहूदा प्रदर्शन सा होता है!
    जब तक दूल्हा-दुल्हन स्टेज पर आते हैं उसके पहले,और बादमें भी निकट के सगे संम्बंधी पति-पत्नी, शुद्ध धंधेबाज़ फोटोग्राफर के निर्देश पर उलूल-जुलूल पोज़ देते हुए फोटो खिंचवाते रहते हैं,जबकि सामने लगी कुर्सियों पर तमाम सगे-सम्बन्धी, बुजुर्ग व अन्य लोग बैठे होते हैं!निर्लज्जता का ऐसा प्रदर्शन सिर्फ फ़िल्म वालों को या भांडों को ही शोभा दे सकता है,हमको कतई नहीं ! यही हाल दूल्हा-दुल्हन का भी है।फोटोग्राफर उनको भी स्टेज पर ही सबके सामने उलूल-जुलूल निर्देश देता रहता है,और वे भी तमाम लोगों के सामने मजबूरीवश बेहया होते रहते हैं!
     बहुएं,ससुराल में बेशक बेटी के समान ही मानी जानी चाहिए,किन्तु वे ससुराल-पिहर के उपस्थित तमाम लोगों,बुजुर्गों के सामने अपने  पति को गलबहियां डाल कर,उटपटांग पोज़ बना कर खुलेआम फोटो खिंचवाएं,तो फिर हमें अपने संस्कारों का पुनर्निरीक्षण ज़रूर कर लेना चाहिए!
     आजकल चल रही तथाकथित "प्री वेडिंग शूट" भी शुद्ध धंधेबाज़ फोटोग्राफरों के मन की उपज मात्र है,जिसमें हमारी शर्मोहया तार-तार हो रही है और फोटोग्राफरोकी जेबें भर रही है!

     ये सारे के सारे चोंचले देख कर ऐसा लगता है जैसे हमारे समाज में भी हीरो और हीरोइन बनने को संस्कारी आत्माएं मचल पड़ी है!मुझे क्षमा करें,किन्तु हीरो-हेरोइन बन कर फोटो शूट करने की जगह कमसे कम शादी या अन्य कोई पारिवारिक,सामाजिक समारोह तो किसी भी तरह से मुफीद नहीं है।अगर किसी की आत्माएं ऐसे ही फोटो शूट करवाने तथा फैशन के नाम पर तार-तार कपड़े पहनने को और फिर फेसबुक-इंस्टाग्राम पर फोटो अपलोड करने को मचल ही रही है तो कृपया इस देश में और विदेश में बहुत से पर्यटक स्थल हैं,जहां अपनी निर्लज्ज ख्वाहिशें पूरी की जा सकती है!और रही बात फेसबुक और इंस्टाग्राम की,तो वहां ऐसे बेहुदे फोटो अपलोड कर आपको आठ-दस लाईक और दो-चार झूठे कमेंट के अलावा मिलना भी क्या है?हीरो-हेरोइन को इन सबके लिए लाखों-करोड़ों मिलते हैं,वो उनका धंधा है,लेकिन आपको इस बेहूदगी का,इस निर्लज्जता के लिए कोई फूटी कौड़ी भी देता हो तो बताओ?

    महावीर के अनुयायियों,जागो,आंखें खोलो।महावीर प्रभु ने तो त्याग,संयम और मुक्ति के लिए वस्त्र भी त्याग दिए और पूजनीय बन गए,जबकि हम आज शर्मोहया,संस्कार,और क्षमा करें, (फैशन के वशीभूत हो) कुछ हद तक वस्त्र भी त्याग कर मात्र निर्लज्जता और बेशर्मी के नितनये कीर्तिमान बना कर ना जाने कौनसे उदाहरण प्रस्तुत करने पर तुले हुए हैं!हदों से बाहर जाना और अपने संस्कारों का कत्ल करना,खुदके पतन की नींव रखने के समान है!
    मैं जानता हूँ कईं "अत्याधुनिक" आत्माएं,जो आधुनिकता और बेशर्मी में कोई भेद नहीं करते और दोनों को पर्यायवाची ही मान चुके हैं ,मुझे दकियानूसी ठहराएंगे! मुझे अपने संस्कारों के पक्ष में ये आक्षेप झेलना भी मंजूर है!
     अपन ने तो आईना दिखा दिया! अब आप चाहें तो इस आईने को तोड़ दें या फिर इसका प्रतिबिम्ब बदल दें! इससे ज्यादा कुछ और बोलूंगा तो फिर आप ही बोलोगे कि बोलता है!
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लेखक- अशोक पुनमिया
लेखक-कवि-पत्रकार-ब्लॉगर 
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'

Tuesday, 3 January 2017

हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है-17
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    आज मैं जो बात कर रहा हूँ,ये बात भी कोई नयी नहीं है।बल्कि शायद बहुत से लोग जानते भी हैं।हाँ इतना ज़रूर है कि इस पर अमूमन चर्चा नहीं की जाती।
    मैं कईं बार अपने ऐसे परिचितों से मिलता हूँ जो अपनों के ही सताये हुए हैं!सताये हुए ही क्या,बस यूँ समझ लीजिए कि अपनों के ही द्वारा धकियाये हुए हैं! 
    जी हां मैं बात कर रहा हूँ उन लोगों की जिनको खुद के ही भाईयों या काका-बाबाओं ने अपनी पैतृक संपत्ति से बेदखल कर दिया!सारी पैतृक चल-अचल संपत्ति स्वयं ही हड़प बैठे और उतना ही अधिकार रखने वाले दूसरे रिश्तेदार को बिना कुछ दिए बाहर कर दिया!
    मैं अपने समाज के कईं ऐसे बंधुओं को जानता हूँ जो भाड़े की खोली में दो जून की रोटी के लिए भी मशक्कत कर रहे हैं और उनके ही अपनों ने उन्हें अपनी पैतृक संपत्ति से बेदखल कर उन पर स्वयं ने ही कब्ज़ा कर रखा है।और ताजुब की बात तो ये है कि अपनों को पैतृक संपत्ति से बेदखल कर बेघर करने वाले अमूमन हर तरह से समृद्ध-सक्षम है!ऐसे लोग अगर इंसानियत और अपनेपन के नाते चाहें तो इसका उलट भी कर सकते हैं,अर्थात अपनी पैतृक संपत्ति को अपने कमजोर रिश्तेदार को ही दे सकते हैं क्योंकि वे स्वयं के लिए सारा कुछ जुटाने की कुव्वत रखते हैं।लेकिन अफ़सोस कि वे इतना करने के बजाय उनका हिस्सा भी उन्हें नहीं देते और सारा हड़प कर बैठ जाते हैं!
    हो सकता है ये सब कुछ पढ़ते वक़्त आपकी नज़रों के सामने भी बहुत से ऐसे लोग आ रहे होंगे जो अपनों के सताये हुए होंगे! आप ध्यान से देखेंगे तो ये सारे के सारे हड़पु लोग आपको हर तरह से समृद्ध-सक्षम ही मिलेंगे!
    अब सवाल ये उठता है कि क्या ऐसा अनुचित कार्य करने वाला किसी भी दृष्टि से महावीर का अनुयायी हो सकता है?महावीर का सच्चा अनुयायी तो प्राणिमात्र के लिए बहुत कुछ न्योछावर करने को तैयार रहता है,दान को पूण्य मानता है,कमजोर की मदद करता है,गैरों को मुसीबत में गले लगाता है,तो फिर आखिर अपने ही भाई,अपने ही रिश्तेदार को घर से बेदखल कर,उसकी संपत्ति हड़प कर,क्या साबित किया जा रहा है?क्या ऐसे लोग जैन धर्म और प्रभु महावीर के अनुयायी होने की योग्यता भी रखते हैं?
    बात कड़वी है,और हड़पु लोगों को चुभेगी भी!चुभनी भी चाहिए,ताकि वे इस चुभन को महसूस करें और अपनी गलती को सुधार कर अपनों को उनका हिस्सा,उनका हक दे कर उनके जीवन को भी बेहतर बनाने में सहायक हो और साधर्मिक भक्ति का वास्तविक अर्थ समझ कर महावीर के सच्चे अनुयायी बन सके।
    अगर आप भी ऐसे हड़पु लोगों को जानते हैं तो इस लेख को वाया-मीडिया उन तक ज़रूर पहुंचाईए,हो सकता है किसी हड़पु का ज़मीर जागृत हो और किसी वंचित को उसका हक़ मिल सके।ऐसा करके आप भी कुछ पूण्य अवश्य ही कमा लेंगे!

    अपन ने जो सोचा-समझा,आपको बता दिया।अब आपको ठीक लगे तो आप भी इस पर विचार करें।मैं और ज्यादा कुछ बोलूंगा तो फिर आप ही बोलोगे कि बोलता है !

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लेखक- अशोक पुनमिया
लेखक-कवि-पत्रकार-ब्लॉगर 
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'

Wednesday, 16 November 2016

हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है-16
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महावीर की वाणी समझ लेते तो मोदी का झटका ना लगता !
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    मोदी ने बहुत ही जोर का झटका दिया है.अच्छे-अच्छे तीसमारखां जड़ों से उखड गए.बड़े-बड़े बरगद,पीपल हिल गए.काले धन की पिच पर धुंआधार बेटिंग करने वाले दस-बीस हज़ार की सेटिंग करने की स्थिति में आ गए.सेठजी को अचानक दो-चार हजार के भी वांदे हो गए.अच्छे अच्छे धनपतियों को परिवार सहित बैंकों के बाहर कतार में घंटों लगना पडा.घर में पड़े नोटों के बण्डल को कहाँ ठिकाने लगाएं,ये चिंता चौबीसों घंटे सताने लगी.शादियों सहित अन्य भभकेदार-दिखावटी समारोह गले की फांस बन गए.वे 'काली-धोली' लक्ष्मी पुत्र जो सुबह शाम डिजाईनर वस्त्रों में मंदिर जाकर,धर्म की जाजम पर सबसे आगे बिराजमान हो बोलीयों के बलबूते चापलूसों द्वारा 'भाग्यशाली-पुण्यशाली' का तमगा पाकर धर्मधुरंधर होने का भ्रम पाले खुद को सबसे बड़ा धार्मिक समझते रहे,वे आज उसी भगवान् को कोस रहे होंगे कि हे भगवान् हम तो तुझे इतना चढ़ावा चढाते हैं,इतना पूजते हैं,फिर भी तूने हमारी 'वाट' क्यूँ लगा दी! और भगवान् बेशक मंद मंद मुस्कुरा रहे होंगे,ये सोचते हुए कि 'पगले मैंने कब माँगा था ये सब तुझसे? तू तो अगर मेरी वाणी सुनने के साथ साथ समझ भी लेता तो आज मोदी भी तेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता था!'
    मित्रों,हमने तो शायद महावीर की वाणी सुनी ही है,किन्तु लगता है मोदी ने तो इसको समझ भी लिया है! महावीर की वाणी को सुन-समझ कर उसे अमल में लाने वाला हमारा साधू-संत समुदाय आज कितना सुखी है! क्या मोदी के झटके का उन पर राई रत्ती भर भी असर हुआ है? ठीक है हम सभी साधु-संत नहीं बन सकते,किन्तु महावीर की वाणी को थोड़ा सा भी अपने जीवन में उतार देते तो मोदी द्वारा दिए गए झटकों के अलावा भी कईं झटकों से हमेशा ही बचे रह सकते थे!
    हर काम में प्रदर्शन और दिखावे ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा है.जिनाज्ञा से विरक्त हो कर धर्म तक को हमने प्रदर्शन की वस्तु बना कर रख दिया है.प्रभु की भक्ति-पूजा करेंगे तो वो भी पुरे परिवार के लिए एक सरीखे, महंगे डिजाईनर पूजा के वस्त्रों में! घर में किसी की मृत्यु हो गयी और उठावना या शोक सभा भी रखी है तो उसमें भी चकाचक एक जैसे डिजाईनर वस्त्र,जैसे कि घर में शोक का नहीं बल्कि आनंद का माहोल हो! हमारी सोच-समझ,चेतना-चिंतन का स्तर कहाँ पहुँच गया,इसकी किसी को फ़िक्र ही नहीं! भगवान् की पूजा,भक्ति,दर्शन तक में अहंकारयुक्त धनबल,भ्रष्ट आचरण घुस गया.उस पर तुर्रा ये कि मुझ जैसा तो कोई भक्त ही नहीं!
     मुझे क्षमा करें,मैं अपने ही समाज के लक्ष्मी पुत्रों पर आई इस विपदा का मजाक नहीं उड़ा रहा और ना ही खुश हो रहा हूँ.बल्कि मुझे दुःख इस बात का है कि महावीर जैसे प्रभु की संतान हो कर भी हमें ये सब भुगतना पड रहा है,क्योंकि हमने अपने प्रभु के संदेशों को आचरण में उतारा ही नहीं और बस ढकोसले ही करते रहे! मोदी की इस मार ने हमें बता दिया है कि प्रभु महावीर की वाणी को आचरण में ढाले बिना सुखी जीवन जीने का और कोई मार्ग है ही नहीं.कल्पना कीजिये,आज करोड़ों-अरबों जो एक  ही झटके में रद्दी हो गए उसे जुटाने में कितने लोग, कितने दिन, कितने दुराचरण, कितनी मेहनत, कितने पाप,कितने डर लगे होंगे ! कितने समझोते,कितने झगडे किये होंगे! कितनी रातों की नींद और कितने दिनों का चैन खोया होगा! किन किन के पाँव पकडे होंगे,किन किन की गुलामी की होगी! और बरसों बाद जब परिणाम शून्य तो हालत क्या होगी,हम समझ सकते हैं! ज़रा सोचिये,अगर इसमें से थोड़ा सा वक्त प्रभु महावीर की वाणी को समझने,उसे जीवन मे उतारने तथा सच्चा जैन बनने में लगा दिया जाता तो फिर जो भी कमाई होती वो एक नम्बर की ही होती,कभी भी किसी के द्वारा ना लुटी जाने योग्य ही होती,और ना ही दुःख का कारण बनती ! क्योंकि महावीर की वाणी को समझ कर आचरण में ढालने वाला दो नम्बरी, छुपाने योग्य कमाई कर ही नहीं सकता! असली भाग्यशाली और पुण्यशाली बनने के लिए प्रभु के दरबार में 'नोटों की गरमी' की नहीं बल्कि आचरण में 'प्रभु महावीर जैसी नरमी' की ज़रूरत होती है.
    जैन धर्म का मूल समझ लें तो इसमें काले धन वाले संग्रहों, भभकों, दिखावों, आडम्बरों, का कहीं कोई स्थान है ही नहीं. हमारे वन्दनीय साधू संतों को देख कर भी अगर हम ये नहीं समझ पाते हैं और अपने धन के प्रभाव से उन्हें भी अपने इन आचरणों में सहभागी बना लेते हैं तो हमें अब गहरे चिंतन की जरुरत है.

    अपन ने जो सोचा-समझा,आपको बता दिया।अब आपको ठीक लगे तो आप भी इस पर विचार करें।मैं और ज्यादा कुछ बोलूंगा तो फिर आप ही बोलोगे कि बोलता है !

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लेखक- अशोक पुनमिया
लेखक-कवि-पत्रकार-ब्लॉगर 
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'

Monday, 7 November 2016

हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है-15
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'हल्दी' की 'जल्दी' में गुम ना हो इंसानियत के सरोकार !

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सर्दी ने दस्तक देदी है.
   सुबह-शाम पड रही गुलाबी ठंडक अच्छा अहसास दे रही है.
  दोस्त लोग हल्दी की गोठ की चर्चा करने लगे हैं.इसमें कोई बुराई भी नहीं.गोठ करना अपनी परम्परा है और संस्कृति भी है.मिलबैठ कर साथ-साथ खाने से अच्छी बात भला और हो भी क्या सकती है !
  लेकिन दोस्तों,हमें सर्दी में हल्दी की गोठ करने के साथ-साथ अपने सामाजिक सरोकारों को भी ध्यान में रखना ही चाहिए.यक़ीनन अगर हम ऐसा करेंगे तो हमारी इस हल्दी पार्टी का मजा ज़रूर दुगुना हो जाएगा.
  इस ठण्ड के मौसम में मैं बात कर रहा हूँ अपने ही उन बंधुओं की जो स्वेटर-कम्बल के अभाव में ठिठुरेंगे!
  हल्दी की गोठ करते हुए अगर हम अपने ही कुछ अभावग्रस्त बंधुओं को ठिठुरता देखेंगे तो क्या वो हल्दी हमारे गले उतर पाएगी ?एक तरफ हमारे अपने ही कुछ अभावग्रस्त बच्चे,बूढ़े,स्त्री-पुरुष ठण्ड में ठिठुरते रहे,फटे कपड़ों में सर्दी का कहर झेलते रहे,और हम अगर उनसे आँखें फेर कर हल्दी की चकाचक गोठें उड़ाते रहें,तो दोस्तों फिर हमें अपना आत्मावलोकन करना होगा,अपनी इंसानियत को टटोलना पडेगा!
  आईये दोस्तों,इस सर्दी के मौसम में हम संकल्प करें कि हमारे गोठ समूह हल्दी पार्टी करने से पहले अपने सामर्थ्यानुसार 2 - 4 - 6 - 8....स्वेटर, कम्बल, चप्पल, मोज़े जैसी वस्तुओं को, अपने आसपास के जरुरतमंद लोगों में वितरित करेंगे,उन्हें ठण्ड से बचायेंगे,अपने सामाजिक सरोकारों को पूरा करेंगे तथा बेबस-लाचार-मज़बूर चेहरों पर भी थोड़ी मुस्कराहट,थोड़ी गर्माहट लायेंगे और फिर ही हम हल्दी को गोठ करेंगे.
  इसमें मारवाड़ मीडिया भी आपके साथ है.अपने ही कुछ अभावग्रस्त बंधुओं को प्रकृति की मार से बचाने के इस सुकृत में जो भी बंधू अथवा समूह शामिल होगा,उनके इस सुकृत का मारवाड़ मीडिया के आगामी अंकों में फोटो सहित विवरण दिया जाएगा,ताकि समाज के अन्य लोगों में अपने अभावग्रस्त बंधुओं के प्रति जागृति फैले और अधिक से अधिक लोग अपने सामाजिक सरोकारों के प्रति आगे आ सके.
  मित्रों,ये ईश्वर की कृपा है कि हमें मानव जीवन मिला है.तो आईये अपनी मानवता को ज़िंदा रखें,ज़िंदा करें, ताकि प्रकृति के प्रकोप से असमय मौत के मुंह में समाने को मजबूर इंसानों का जीवन बचाया जा सके.

  अगर आपको ये मेसेज काम का लगे,आपके दिल को छू जाए तो कृपया इसे आगे फोरवर्ड अवश्य करे.शायद किसी की इंसानियत जागृत हो जाए और सर्दी में ठण्ड से ठिठुरता कोई अभावग्रस्त बच्चा,बूढा,स्त्री-पुरुष सर्दी के कहर से बच सके.

    अपन ने जो सोचा-समझा,आपको बता दिया।अब आपको ठीक लगे तो आप भी इस पर विचार करें।मैं और ज्यादा कुछ बोलूंगा तो फिर आप ही बोलोगे कि बोलता है !

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लेखक- अशोक पुनमिया
लेखक-कवि-पत्रकार-ब्लॉगर 
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'
मेरे अन्य ब्लॉग-
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/pate-ki-baat/

Saturday, 8 October 2016

हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है-14
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68 उपवास की तपस्या,मौत और विवाद

   हैदराबाद में 13 वर्षीय जैन बिटिया आराधना का 68 उपवास के पारने के बाद तबियत बिगड़ने से निधन हो गया।समाचारों में डॉक्टर्स के हवाले से बताया गया कि निधन की वजह आँतों का चिपकना,किडनी फ़ैल होना और हार्ट एटेक रहा।
   इस दुखद घटना से हम सभी को अत्यंत दुःख हुआ है।निधन की वजह चाहे जो रही हो,जैन समाज पर आज बाहर से कईं आक्षेप लग रहे हैं,जांच की मांग की जा रही है,मृतका के परिवार सहित वंदनीय साधू समाज पर अंगुलियां उठायी जा रही है,तप-तपश्चर्या को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है!और हमारा जैन समाज क्या कर रहा है? वो हमेशा की तरह इस दुखद घटना को भी मात्र धर्म के चश्में से देख कर मुंह पर पट्टी बाँधने का पाठ पढ़ा रहा है!!
   तप-तपश्चर्या को दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि धार्मिक,आध्यात्मिक और स्वास्थ्य की दृष्टि से इनके लाभ प्रतिपादित हो चुके हैं।धर्म और साधू समाज को भी दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि इस तरह की दुखद घटना में उनकी सहभागिता हो ही नहीं सकती। परिवारजन पर आक्षेप तो सरासर मूर्खता ही है क्योंकि कौनसा ऐसा परिवार होगा जो अपनी फूल सी बेटी को ईश्वर के घर भेजना चाहेगा?
   तो फिर आखिर जिम्मेदार कौन?इसे भगवान की मर्जी कह कर चुप हो जाना,ना केवल भगवान् का अपमान करना ही होगा,बल्कि ऐसी दुखद घटनाओं की पुनरावृत्ति को भी आमन्त्रण देना ही होगा। सवाल फिर वही का वही,कि तो फिर आखिर जिम्मेदार कौन?
   मुझे माफ़ करें,लेकिन तमाम खतरे उठा कर कहना चाहूँगा कि इसका जिम्मेदार मैं हूँ,आप है,हम सभी है! धर्म और धार्मिक क्रियाओं को हमने आडंबर, अंधविश्वासइनामोंजयकारों, चकाचौंधभव्यता से जोड़ दियाजबकि धर्म और धार्मिक क्रियाएँ सिर्फ और सिर्फ अध्यात्म और दिव्यता से जुडी है।हमें चिंतन करना होगा और सोचना होगा कि धर्म और धार्मिक क्रियाएँ अच्छे तरीके से जीना सिखाती है,वे मौत के मुहाने पर नहीं पहुंचाती।मौत के मुहाने पर पहुँचते हैं हम अपनी नासमझी से,और बच्चे हमारी नासमझी और अंधविश्वास से।धर्म और धार्मिक क्रियाएँ अपने शारीरिक सामर्थ्य के अनुसार की जाए तो अकल्पनीय लाभ पहुंचाती हैं और इनका ध्यान नहीं रखा जाए तो हैदराबाद जैसी दुखद घटनाएं घटती है!
   बच्चे नादां है।उनकी सोच-समझ सिमित है।उनमें धर्म और धार्मिक क्रियाओं के प्रति एक परिपक्व और वास्तविक समझ पैदा करने का जिम्मा हम सभी का है,जिससे अमूमन बचा जाता है,क्योंकि यहां फिर वही आधी अधूरी, अधकचरी सोच के साथ धर्म के अपमान का मुद्दा उछाल दिया जाता है।
   मुझे क्षमा करें,13 वर्ष की उम्र कोई मरने की उम्र नहीं होती है।ये उम्र धर्म और धार्मिक क्रियाओं को उनके वास्तविक रूप में समझने-जानने और फिर बड़े और परिपक्व हो कर पुरे समाज को समझाने जितना ज्ञान पाने के लिए लग जाने की होती है,हो सकती है।कोई मासूम 'आराधना' अगर आराधना करते हुए कच्ची उम्र में स्वर्ग सिधार जाए और हम धर्म की दुहाई देकर मुंह पर पट्टी बाँध कर बैठ जाएँ या दूसरों को बैठने का उपदेश देते रहें तो फिर हमें अपनी चेतना को झँझोड़ने,जगाने की ज़रूरत है,धर्म और धार्मिक क्रियाओं को उनके सही रूप में समझने-समझाने,करने-कराने की जरुरत है।धर्म की आड़ में मूर्खता भरी चुप्पियों ने धर्म का पहले ही बहुत नुकसान कर दिया है।धर्म को उसके सही रूप में बचाने के लिए समाज के हित चिंतकों को सत्य के साथ मुखर होना ही पडेगा,अन्यथा समाज की तरफ बाहरी लोगों की उठती अंगुलियों को रोक पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकीन भी होगा!
    अपन ने जो सोचा-समझा,आपको बता दिया।अब आपको ठीक लगे तो आप भी इस पर विचार करें।मैं और ज्यादा कुछ बोलूंगा तो फिर आप ही बोलोगे कि बोलता है !

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लेखक- अशोक पुनमिया
लेखक-कवि-पत्रकार 
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'