Tuesday, 4 July 2017

हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है-19
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चातुर्मास : "धर्मध्यान" और "समाजध्यान" दोनों हो 
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   चातुर्मास निकट आ रहा है।जगह जगह धूमधाम से वंदनीय महाराज साहेब के प्रवेश हो रहे हैं।प्रतिदिन गुरुओं के मुखारविंद से प्रवचन श्रवण करने का सुअवसर मिलेगा,अपनी अपनी सामर्थ्यानुसार सभी बंधू धर्मध्यान में रत हो कर दान-पुण्य कर चातुर्मास को सार्थक करेंगे। कमोबेश हर वर्ष ऐसा ही होता है और पुरा समाज इस दरम्यान एकजुट हो सामूहिक रूप से धर्माराधना करता है।इससे हमारे संस्कार,धर्म भावना मज़बूत होती है,नयी पीढ़ी को अपने समाज,धर्म को और भी बेहतर तरीके से जानने-समझने का मौक़ा मिलता है।
   बदलते वक़्त में हमें इस मौके पर एक और चौका लगाने की ज़रूरत है।वो है "धर्मध्यान" के साथ ही साथ "समाजध्यान" की भी अनिवार्य रूप से शुरुआत की जाए।हमारा धर्म जितना श्रेष्ठ है,कहते हुए तकलीफ होती है,लेकिन उतना ही हमारा समाज आज आडम्बर,दिखावे और गलत परम्पराओं का शिकार भी है! धर्म और समाज में जबरदस्ती घुसा दी गई आडम्बर-दिखावे की प्रवृति और कुछ मुर्ख हेकड़ीबाज़ लोगों की सनक ने आज विश्व के सर्वश्रेष्ठ धर्म के अनुयायिओं को अपने समाज के बारे में गहनता से चिंतन करने को विवश कर दिया है!बात चाहे धार्मिक अनुष्ठानों को हो या विवाह, मृत्यु,जन्मदिन, जैसे ना गिने जा सकने वाले अनंत सामाजिक आयोजनों की, दिखावे, आडम्बर और चन्द लोगों के सनकीपन ने इन सभी को इतना विकृत रूप दे दिया है कि इससे ना केवल हमारे महान धर्म की अवमानना हो रही है,अपितु समाज का ढांचा भी बिखर और बिगड़ रहा है।समाज का आर्थिक रूप से कमजोर हिस्सा इन विकृतियों का सबसे बड़ा शिकार हो कर और ज्यादा कमजोर, ऋणग्रस्त, अवसादग्रस्त हो रहा है और चुपचाप पीड़ा भोग रहा है!
   इधर आजकल हमारे समाज में लगभग अधेडावस्था को प्राप्त हो चुके पति-पत्नी में विभिन्न पर्यटकस्थलों पर घुमते हुए "विचित्र मुद्राओं" और "विचित्र वेशभूषाओं" में, जिन्हें 'बेहूदा' और 'शर्मनाक' कहा जा सकता है, फोटो खिंचवा कर 'फेसबुक,इन्स्टाग्राम और वाट्सएप' जैसे सोशल मीडिया पर डालने का प्रचलन बढ़ चला है! इस उम्र में हीरो-हिरोइन सा 'मॉड' दिखने की लालसा ने बेशर्मी की सारी हदें जैसे पार कर ली है,और लोग शर्मिंदा होने की बजाय 'एक दुसरे का अनुसरण' करने में लगे हैं! ये सरासर अपने संस्कारों का हनन है,जिसे समझ कर स्व विवेक से नहीं रोका गया तो आने वाली पीढ़ी को हम कैसे और क्या संस्कार दे पायेंगे?
   ये बातें कोरी मज़ाक या लफ़्फ़ाज़ी भर नहीं है,बल्कि वो कटु सत्य है,जो समाज के हर चिंतक-शुभचिंतक की नज़र में है, और वो सहज ही उसे देख पा रहा है,किन्तु ना जाने किस मजबूरीवश मौन हैं! क्या हमारे समाज के लक्ष्मीपुत्रों-सुसम्पन्न बंधुओं और साधू-संतों का ये दायित्व नहीं बनता है कि वे चातुर्मास में "धर्मध्यान" के साथ-साथ "सामाजध्यान" के ऊपर भी चिंतन-मनन करे और समाज को पुनः धर्म के अनुरूप तथा संस्कारी बनाने में भी अपनी भूमिका का निर्वहन करे? एक मज़बूत,आदर्श,उच्च विचारोंयुक्त,रूढ़िवाद विहीन,स्वधर्म आचरणयुक्त तथा संस्कारित समाज ही अपनी धर्मध्वजा को मज़बूती से थामे रख सकता है,उसे विश्व में चहुँ और फहरा सकता है।
   कुरीतियों,आडम्बरों,दिखावों और कुसंस्कारों से ग्रस्त समाज आखिर अपने धर्म की रक्षा भी कैसे और कब तक कर पायेगा,क्योंकि वहां तो आचरण ही धर्म विरूद्ध है! समाज के आगेवानों को,साधू संतों को, संपन्न लक्ष्मी पुत्रों को इन बातो पर अब गम्भीरता से गौर करना चाहिए और इसी चातुर्मास से "धर्मध्यान" के साथ-साथ "समाजध्यान" को भी अनिवार्य रूप से लागू करना चाहिए।चातुर्मास पर समाज एक जगह इकट्ठा हो कर धर्माराधना करता ही है,प्रवचन सुनता ही है।उसी जगह पर इकट्ठे हुए समाज के लोगों को एक निश्चित समय पर समाज/धर्म में घुस आई तमाम बुराईयों/बीमारियों/कुसंस्कारों को तिलांजलि देने को प्रेरित करते हुए तथा अपने संस्कारों की याद दिलाते हुए अपने समाज,धर्म और संस्कारों की रक्षा की शपथ दिलानी चाहिए और विरोधियों को सवालों के तर्कसम्मत ज़वाब देकर संतुष्ट करना चाहिए। ये आज की ज़रूरत है,क्योंकि धर्म,समाज,संस्कार और भगवान् महावीरके मूल्यों को बचाये रखने के लिए इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है।
   लेखक का मन्तव्य अपने धर्म,संत समुदाय और साधर्मिकों का अपमान करना कदापि नहीं है,बल्कि अपने धर्म और समाज के प्रति अपनी उच्च भावनाओं को अपने बंधुओं के सम्मुख खुले दिल से रखना मात्र  है।बावज़ूद इसके,कहीं पर भी कुछ भी कटु या धर्मविरुद्ध कहने में आया हो,तो अंतर्मन से मिच्छामी दुक्कड़म।
     अपन ने तो आईना दिखा दिया! अब आप चाहें तो इस आईने को तोड़ दें या फिर इसका प्रतिबिम्ब बदल दें! इससे ज्यादा कुछ और बोलूंगा तो फिर आप ही बोलोगे कि बोलता है!
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लेखक- अशोक पुनमिया
लेखक-कवि-पत्रकार-ब्लॉगर 
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया' पाक्षिक 

Friday, 23 June 2017

हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है-18
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आधुनिकता के हवन में संस्कारों की आहुति !
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     एक तरफ अपनी संस्कृति बचाने की बातें की जा रही हैं,वहीं दूसरी तरफ आधुनिकता के नाम पर अपने संस्कारों को तिलांजलि दी जा रहीहै!शर्मोहया,जिसका कि हमारी संस्कृति और संस्कारों में अहम स्थान है,और जिसके गहरे अर्थ भी है, आज दम तोड़ते से लग रहे हैं!

     मुझे क्षमा करें,किन्तु ये आज आम नज़ारा है कि हम अपने समाज की किसी शादी या अन्य समारोह में शिरकत करने जाएं तो वहां मेकप,फैशन,और तथाकथित फोटो सेशन के नाम पर बेहूदा प्रदर्शन सा होता है!
    जब तक दूल्हा-दुल्हन स्टेज पर आते हैं उसके पहले,और बादमें भी निकट के सगे संम्बंधी पति-पत्नी, शुद्ध धंधेबाज़ फोटोग्राफर के निर्देश पर उलूल-जुलूल पोज़ देते हुए फोटो खिंचवाते रहते हैं,जबकि सामने लगी कुर्सियों पर तमाम सगे-सम्बन्धी, बुजुर्ग व अन्य लोग बैठे होते हैं!निर्लज्जता का ऐसा प्रदर्शन सिर्फ फ़िल्म वालों को या भांडों को ही शोभा दे सकता है,हमको कतई नहीं ! यही हाल दूल्हा-दुल्हन का भी है।फोटोग्राफर उनको भी स्टेज पर ही सबके सामने उलूल-जुलूल निर्देश देता रहता है,और वे भी तमाम लोगों के सामने मजबूरीवश बेहया होते रहते हैं!
     बहुएं,ससुराल में बेशक बेटी के समान ही मानी जानी चाहिए,किन्तु वे ससुराल-पिहर के उपस्थित तमाम लोगों,बुजुर्गों के सामने अपने  पति को गलबहियां डाल कर,उटपटांग पोज़ बना कर खुलेआम फोटो खिंचवाएं,तो फिर हमें अपने संस्कारों का पुनर्निरीक्षण ज़रूर कर लेना चाहिए!
     आजकल चल रही तथाकथित "प्री वेडिंग शूट" भी शुद्ध धंधेबाज़ फोटोग्राफरों के मन की उपज मात्र है,जिसमें हमारी शर्मोहया तार-तार हो रही है और फोटोग्राफरोकी जेबें भर रही है!

     ये सारे के सारे चोंचले देख कर ऐसा लगता है जैसे हमारे समाज में भी हीरो और हीरोइन बनने को संस्कारी आत्माएं मचल पड़ी है!मुझे क्षमा करें,किन्तु हीरो-हेरोइन बन कर फोटो शूट करने की जगह कमसे कम शादी या अन्य कोई पारिवारिक,सामाजिक समारोह तो किसी भी तरह से मुफीद नहीं है।अगर किसी की आत्माएं ऐसे ही फोटो शूट करवाने तथा फैशन के नाम पर तार-तार कपड़े पहनने को और फिर फेसबुक-इंस्टाग्राम पर फोटो अपलोड करने को मचल ही रही है तो कृपया इस देश में और विदेश में बहुत से पर्यटक स्थल हैं,जहां अपनी निर्लज्ज ख्वाहिशें पूरी की जा सकती है!और रही बात फेसबुक और इंस्टाग्राम की,तो वहां ऐसे बेहुदे फोटो अपलोड कर आपको आठ-दस लाईक और दो-चार झूठे कमेंट के अलावा मिलना भी क्या है?हीरो-हेरोइन को इन सबके लिए लाखों-करोड़ों मिलते हैं,वो उनका धंधा है,लेकिन आपको इस बेहूदगी का,इस निर्लज्जता के लिए कोई फूटी कौड़ी भी देता हो तो बताओ?

    महावीर के अनुयायियों,जागो,आंखें खोलो।महावीर प्रभु ने तो त्याग,संयम और मुक्ति के लिए वस्त्र भी त्याग दिए और पूजनीय बन गए,जबकि हम आज शर्मोहया,संस्कार,और क्षमा करें, (फैशन के वशीभूत हो) कुछ हद तक वस्त्र भी त्याग कर मात्र निर्लज्जता और बेशर्मी के नितनये कीर्तिमान बना कर ना जाने कौनसे उदाहरण प्रस्तुत करने पर तुले हुए हैं!हदों से बाहर जाना और अपने संस्कारों का कत्ल करना,खुदके पतन की नींव रखने के समान है!
    मैं जानता हूँ कईं "अत्याधुनिक" आत्माएं,जो आधुनिकता और बेशर्मी में कोई भेद नहीं करते और दोनों को पर्यायवाची ही मान चुके हैं ,मुझे दकियानूसी ठहराएंगे! मुझे अपने संस्कारों के पक्ष में ये आक्षेप झेलना भी मंजूर है!
     अपन ने तो आईना दिखा दिया! अब आप चाहें तो इस आईने को तोड़ दें या फिर इसका प्रतिबिम्ब बदल दें! इससे ज्यादा कुछ और बोलूंगा तो फिर आप ही बोलोगे कि बोलता है!
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लेखक- अशोक पुनमिया
लेखक-कवि-पत्रकार-ब्लॉगर 
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'

Tuesday, 3 January 2017

हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है-17
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    आज मैं जो बात कर रहा हूँ,ये बात भी कोई नयी नहीं है।बल्कि शायद बहुत से लोग जानते भी हैं।हाँ इतना ज़रूर है कि इस पर अमूमन चर्चा नहीं की जाती।
    मैं कईं बार अपने ऐसे परिचितों से मिलता हूँ जो अपनों के ही सताये हुए हैं!सताये हुए ही क्या,बस यूँ समझ लीजिए कि अपनों के ही द्वारा धकियाये हुए हैं! 
    जी हां मैं बात कर रहा हूँ उन लोगों की जिनको खुद के ही भाईयों या काका-बाबाओं ने अपनी पैतृक संपत्ति से बेदखल कर दिया!सारी पैतृक चल-अचल संपत्ति स्वयं ही हड़प बैठे और उतना ही अधिकार रखने वाले दूसरे रिश्तेदार को बिना कुछ दिए बाहर कर दिया!
    मैं अपने समाज के कईं ऐसे बंधुओं को जानता हूँ जो भाड़े की खोली में दो जून की रोटी के लिए भी मशक्कत कर रहे हैं और उनके ही अपनों ने उन्हें अपनी पैतृक संपत्ति से बेदखल कर उन पर स्वयं ने ही कब्ज़ा कर रखा है।और ताजुब की बात तो ये है कि अपनों को पैतृक संपत्ति से बेदखल कर बेघर करने वाले अमूमन हर तरह से समृद्ध-सक्षम है!ऐसे लोग अगर इंसानियत और अपनेपन के नाते चाहें तो इसका उलट भी कर सकते हैं,अर्थात अपनी पैतृक संपत्ति को अपने कमजोर रिश्तेदार को ही दे सकते हैं क्योंकि वे स्वयं के लिए सारा कुछ जुटाने की कुव्वत रखते हैं।लेकिन अफ़सोस कि वे इतना करने के बजाय उनका हिस्सा भी उन्हें नहीं देते और सारा हड़प कर बैठ जाते हैं!
    हो सकता है ये सब कुछ पढ़ते वक़्त आपकी नज़रों के सामने भी बहुत से ऐसे लोग आ रहे होंगे जो अपनों के सताये हुए होंगे! आप ध्यान से देखेंगे तो ये सारे के सारे हड़पु लोग आपको हर तरह से समृद्ध-सक्षम ही मिलेंगे!
    अब सवाल ये उठता है कि क्या ऐसा अनुचित कार्य करने वाला किसी भी दृष्टि से महावीर का अनुयायी हो सकता है?महावीर का सच्चा अनुयायी तो प्राणिमात्र के लिए बहुत कुछ न्योछावर करने को तैयार रहता है,दान को पूण्य मानता है,कमजोर की मदद करता है,गैरों को मुसीबत में गले लगाता है,तो फिर आखिर अपने ही भाई,अपने ही रिश्तेदार को घर से बेदखल कर,उसकी संपत्ति हड़प कर,क्या साबित किया जा रहा है?क्या ऐसे लोग जैन धर्म और प्रभु महावीर के अनुयायी होने की योग्यता भी रखते हैं?
    बात कड़वी है,और हड़पु लोगों को चुभेगी भी!चुभनी भी चाहिए,ताकि वे इस चुभन को महसूस करें और अपनी गलती को सुधार कर अपनों को उनका हिस्सा,उनका हक दे कर उनके जीवन को भी बेहतर बनाने में सहायक हो और साधर्मिक भक्ति का वास्तविक अर्थ समझ कर महावीर के सच्चे अनुयायी बन सके।
    अगर आप भी ऐसे हड़पु लोगों को जानते हैं तो इस लेख को वाया-मीडिया उन तक ज़रूर पहुंचाईए,हो सकता है किसी हड़पु का ज़मीर जागृत हो और किसी वंचित को उसका हक़ मिल सके।ऐसा करके आप भी कुछ पूण्य अवश्य ही कमा लेंगे!

    अपन ने जो सोचा-समझा,आपको बता दिया।अब आपको ठीक लगे तो आप भी इस पर विचार करें।मैं और ज्यादा कुछ बोलूंगा तो फिर आप ही बोलोगे कि बोलता है !

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लेखक- अशोक पुनमिया
लेखक-कवि-पत्रकार-ब्लॉगर 
सम्पादक-'मारवाड़ मीडिया'